भारत का वह गाँव, जहाँ लोगों को नाम से नहीं बल्कि इस अनोखे तरीके से पुकारा जाता है।

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Photo of भारत का वह गाँव, जहाँ लोगों को नाम से नहीं बल्कि इस अनोखे तरीके से पुकारा जाता है। by Rishabh Bharawa

किसी भी व्यक्ति को पुकारने के लिए हम क्या करते हैं ? उसका नाम पुकारते हैं। नाम न पता होता हो तो सर ,मैडम ,भाई जैसे शब्दों का प्रयोग कर लेंगे लेकिन उसको पुकारने के लिए उसके आगे पीछे कोई धुन थोड़े ना गाने लग जायेंगे। क्योंकि ये हमारे लिए काफी अजीब और हास्यप्रद हो जाएगा।

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हम लोगो का नाम ही हमारी मुख्य पहचान होती हैं लेकिन भारत के मेघालय मे एक ऐसा अनोखा गाँव मौजूद हैं जहाँ के निवासियों के लिए 'नाम मे क्या रखा हैं ?' कथन सटीक लगता हैं।वहा नाम से पुकारने की जगह धुन या सिटी की ध्वनि से गांव के लोगो को आपस मे पुकारा जाता हैं। आप जानते है कि भारत मे आश्चर्यों और रहस्यों की कोई कमी नहीं हैं। हर एक राज्य मे कुछ ऐसी अनोखी और रहस्य्मयी जगह मिल ही जाती हैं जहाँ के बारे मे सुन कर एक बार तो यकीन करना मुश्किल हो जाता हैं तो चलो चलते है इस गाँव की अनोखी रिवाज और प्रथा को जानने -

यह गाँव हैं मेघालय की राजधानी शिलोंग से करीब 65 किमी दूर -कांगथांग गांव जिसकी अनोखी प्रथा के कारण इसको Musical Village of Asia और whistle village of India जैसे कई नाम से भी जाना जाने लग गया हैं। जब आप इस हरी भरी वादियों के बीच बसे गाँव मे जाएंगे तो कई बार आपके कान मे चिड़ियों के बोलने के जैसी आवाज़े सुनाई देगी। एकाध बार तो आप इन्हे पक्षियों की आवाज़ ही समझेँगे या सोचेंगे की कोई गाना गए रहा हैं ,लेकिन जब ये आवाज़े आप लोगो के मुँह से निकलते हुए देखेंगे तो दंग रह जाएंगे और तब आप और ज्यादा अचम्भित हो जाएंगे जब आपको पता लगेगा कि ये धुनें तो यहाँ के लोगो के नाम हैं।करीब 650 लोगो की जनसंख्या वाले इस गाँव मे मुख्य रूप से 'खासी प्रजाति ' के लोग रहते हैं।इन लोगो मे एक प्राचीन परम्परा है जिसके तहत ये लोग अपना कोई सामान्य नाम नहीं रखते हैं ,बल्कि हर एक इंसान को अलग अलग धुन गाकर पुकारा जाता हैं।

बच्चे के पैदा होते ही माँ बनाती हैं अपने बच्चे की पहचान के लिए धुन-

यह गाँव एक स्त्रीप्रधान गाँव हैं ,जहाँ विवाह के बाद पति को अपना घर छोड़ कर पत्नी के घर रहना होता हैं एवं माँ की सारी सम्पति अपनी बेटी को मिलती हैं।जब किसी परिवार मे कोई बच्चा पैदा होता हैं तो माँ अपने बच्चे के लिए 3-4 धुनें बनाती हैं जिसमे से सबसे अच्छी धुन बच्चे के लिए चुनी जाती हैं।यह धुन सामान्यत पक्षियों की चहचहाहट से प्रेरित होती हैं। बच्चा पैदा होने से पहले स्त्रियां यहाँ के जंगल मे भ्र्मण करती हैं और विभिन्न प्रकार के पक्षियों की आवाज़ को सुनकर अपने बच्चे के लिए धुनें बनाती हैं। पैदा होने के बाद बच्चे को बचपन से ही यह धुन अनेको बार सुनाई जाती हैं जिससे वो बच्चा बड़ा होकर अपनी धुन को पहचान सके।

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कैसे करती हैं नाम की जगह ये धुनें काम :

दरअसल ,हर धुन करीब 45 से 50 सेकंड तक लम्बी होती हैं। लेकिन घर के लोगो और पड़ोसियों द्वारा बार बार इतनी लम्बी धुन से पुकारना तो सम्भव नहीं हैं। इसीलिए इसी धुन के शुरुवात की करीब 5 -6 सेकंड की धुन निकनेम की तरह काम करती हैं। यह निकनेम कभी कभी दो लोगो का एक जैसा हो सकता हैं लेकिन पूरी धुन हमेशा सभी की अलग अलग ही होती हैं। ये लम्बी धुनें तब काम आती हैं जब ये लोग जंगलों ,घाटियों ,खेतों मे दूर दूर तक जाते हैं तब किसी दूर जा रहे व्यक्ति को अगर पुकारना हो तो 5-6 सेकंड की धुन इतनी दूरी तक कई बार सुनाई नहीं देती हैं। तो उस समय यह पूरी धुन गाते हैं ताकि लगातार बह रही ध्वनि उन आदमी के कान मे पड़ती हैं।जब उस धुन के नाम वाला आदमी अपनी धुन को सुनता हैं तो जवाब मे वापस अपनी धुन जाता हैं जिससे सामने वाला समझ जाता है कि उसने पुकार सुन ली हैं।

अब यहाँ रखे जाने लगे हैं इस प्रकार के दो नाम :

जैसे जैसे टूरिस्ट लोग अब यहाँ पहुंचने लगे हैं एवं यहाँ के लोगो मे जागृति आ रही हैं तो अब यहाँ दो नाम रखे जाने लगे हैं एक तो धुन वाला नाम ,दूसरा हमारी तरह सामान्य नाम। यह सामान्य नाम क्रिस्चियन धर्म के नाम से प्रभावित होते हैं क्योकि इन जनजातियों के कई लोगो ने क्रिस्चियन धर्म अपना लिया था। यहाँ के निवासी काफी शर्मीले होते हैं एवं हिंदी व अंग्रेजी भी नहीं समझते थे। लेकिन अब यहाँ के बच्चे पढ़ने के लिए बाहर जाने लग गए हैं एवं गांव के लोग कुछ सामान्य हिंदी अंग्रेजी के शब्द सिखने लग गए हैं क्योकि यहाँ आने वाले टूरिस्ट से बात कर सके। हमारी तरह सामान्य वाला नाम केवल बाहरी लोगो से घुलने मिलने के दौरान ही उपयोग मे लिया जाता हैं। जब ये लोग अपने घर या गाँव मे होते हैं तो आज भी धुन से ही बाते करते हैं।

धुन रखने का ऐसा होता हैं सख्त नियम :

दो लोग की धुन यहाँ एक समान नहीं रखी जाती हैं। इस चीज का पालन इतने अनुशाषन से किया जाता हैं कि गाँव के किसी मृत व्यक्ति की धुन भी यहाँ वापस नहीं उपयोग मे ली जा सकती हैं चाहे वो व्यक्ति कितना भी करीबी क्यों ना हो।दरअसल ,ये धुनें इनकी कुलदेवी के प्रति इनकी श्रद्धा व्यक्त करती हैं इसीलिए प्राचीन काल से चली आ रही इस प्रथा से आज तक किसी ने कोई छेड़छाड़ नहीं की हैं। ये धुनें और बातचीत का ये तरीका इस जगह की प्राचीन विरासत हैं जिनकी रक्षा करना जरूरी हैं। पिछले ही साल ,2020 मे इस प्रथा को UNESCO की सूचि मे शामिल करवाने की कोशिश की गयी हैं एवं इस पर प्रयास अभी भी जारी हैं। एक और आश्चर्य की बात यहाँ यह मिलती हैं कि ये लोग इन धुनों को किसी भी कोड मे लिखते भी नहीं हैं। ये केवल याद रखी जाती हैं और इतनी धुनें याद रखना और उससे ये भी पहचान लेना कि कोनसी धुन किस व्यक्ति की हैं ,यह बात भी काफी आश्चर्यजनक हैं।यह प्रथा भारत के इस कांगथोंग गाँव के अलावा आस पास के 15-20 और छोटे छोटे गांवो मे भी प्रचलित हैं।अंतर्राष्ट्रीय लेवल पर बात करे तो ,तुर्की देश के कुस्कोय नामक गाँव मे भी नाम की जगह धुनें ही प्रचलित हैं।

धुनों के प्रचलन की कुछ पौराणिक मान्यताये :

इस गाँव मे प्राचीन समय से ही माना जाता हैं कि गाँव के जंगल में रहनी वाली आत्माएं यदि किसी व्यक्ति का सामान्य नाम पुकारते हुए सुन लेंगी, तो वह व्यक्ति बीमार पड़ जायेगा। इसीलिए ये लोग अपने गाँव मे धुन से ही पुकारते हैं। ये धुनें उनकी बुरी आत्माओं से रक्षा भी करती हैं।

एक कथा के अनुसार एक बार एक व्यक्ति जंगल से अकेला निकल रहा था। तभी कई डकैत उसके सामने आ गये, डकैतों का सामना करने में वह अक्षम था। अपनी जान बचाने वह एक पेड़ पर चढ़ गया और एक अलग तरह की धुन मुँह से बजाकर अपने मित्र को पुकारने लगा।यह सुनकर उसके मित्र वहा आ गये और उसे बचा लिया। यह बात लोगो मे फेल गयी और उन्होंने फिर धुनों को ही नाम रखने की परम्परा शुरू की।

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पर्यटकों के लिए यहाँ ये सुविधाएं हैं :

पर्यटकों के रहने के लिए यहाँ एक बहुत ही खूबसूरत लकड़ी की झोपडी बनायी गयी हैं। जिसमे छह लोग रुक सकते हैं। यह झोपडी काफी आकर्षक और अंदर से काफी खूबसूरत बनी हुई हैं। इसकी खिड़कियों से पहाड़ों का शानदार दृश्य दीखता हैं। इसका बरामदा भी ऐसा बना हैं कि वहां बैठकर चारो तरफ की वादियों का आनंद लिया जा सकता हैं।इस गांव के आसपास कई छोटे मोटे पैदल ट्रेक्स एवं झरने भी मौजूद हैं।इन लोगो का मुख्य कार्य कृषि ,झाड़ू बनाना एवं मधुमक्खी पालन हैं आप इनके साथ रहकर इनकी खेती और अन्य तकनीकों को भी समझ सकते हैं।

प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थित यह गाँव ,यहाँ के लोग,इनका रहन सहन और यहाँ की प्रथाएं आपकी यात्रा को कभी ना भूल सकने देने वाली एक याद बना देगा।

अनुकूल समय :अक्टूबर से मई।

कैसे जाए : शिलॉन्ग , बड़ा बाजार से यहाँ के लिए कई टैक्सी मिलती हैं।

photosource:wikipedia

-ऋषभ भरावा (लेखक -पुस्तक 'चलो चले कैलाश' )

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