रिश्तेदारों ने 15 अगस्त को मेरे घूमने का प्लान चौपट कर दिया, मगर फिर...

Tripoto

साल 2016 में दिल्ली के एक दफ्तर में काम करने से मैनें अपने करियर की शुरुआत की थी। लॉन्ग वीकेंड और ऑफिस की छुट्टियों का हिसाब पहले ही लगा लिया था, ताकि घूमने की जगहों के बारे में प्लान कर सकूँ , एडवांस बुकिंग वगैरह करवानी हो तो करवा लूँ। इस बार 15 अगस्त सोमवार का दिन था। यानी लॉन्ग वीकेंड। यानी खूब सारा घूमना और मस्ती।

यानी मैंने मुक्तेश्वर जाने के लिए रेडबस से टिकट बुक करवा ली। प्लान बनाया कि 14 अगस्त को हाफ-डे में छुट्टी होते ही सीधे फ्लैट जाऊँगा, फिर नहाते ही चप्पल पहनी, बैग उठाया और हेडफोन लगा के शाम को मुक्तेश्वर की बस में खिड़की के पास हवा से बातें करूँगा।

14 अगस्त के दिन हर बार की तरह H.R. की कन्याओं ने ऑफिस को बढ़िया सजाया था। दरवाज़े पर फूलों की बंदनवार और ऑफिस में घुसते ही रंगोली बनी थी, जिस पर कई अपने जूते का निशान छोड़ गए थे। ढंग से बनी रंगोली फिर भी इतनी सुन्दर नहीं लगती, जितनी बिगड़ी हुई रंगोली भद्दी लगती है।

दरवाज़े पर तिरंगे गुब्बारे चिपके थे, जिनमें से एक मेरी शर्ट से लग कर फट गया। बिगड़ी रंगोली और धमाके से दिन की शुरुआत हुई , अंदर जाने पर देखा कि छत से लेकर दीवारों और हरेक के क्यूबिकल पर भी प्लास्टिक के मिनी तिरंगे चिपके हैं। हर तरफ रंग ही रंग थे |

मैं अभी अपनी सीट पर बैठा भी नहीं था कि हरा कुर्ता पहने एक सहकर्मचारी मेरे पास आया और बोला,

" हे सिड, हैप्पी इंडिपेंडेंस डे, ब्रो !"

मैनें सोचा ब्रो - व्रो तो ठीक है, लेकिन आज़ादी की बधाई तो हिंदी में दे देता। अपने आज़ाद देश की सालगिरह तो अपनी मातृभाषा में ही देने की कोशिश कर अनपढ़। हिंदी उतनी मुश्किल भी नहीं होती। पता नहीं किसकी आज़ादी का जश्न मना रहा था; ब्रिटेन या भारत।

पर कोई बात नहीं, आज शाम को मैं ऐसे झूठे देश भक्तों से दूर टी-शर्ट बरमूडा पहने मुक्तेश्वर की बस में गानें सुन रहा होऊँगा।

शाम को ऑफिस का काम निबटा कर एक नए जोश के साथ मैं घर जा रहा था। दिन भर में मोबाइल और पोर्टेबल चार्जर को उनका पेट भरने तक बिजली की खुराक दे दी थी। फ़्लैट में बैग बंधा पड़ा है, बस उसे उठाना है , चप्पल पहननी है और बस में चढ़ना है।

बाथरूम में शावर लेते हुए मैं मुक्तेश्वर के झरनों के बारे में सोच ही रहा था कि फोन बजने लगा।

रेडबस से होगा, बस की जानकारी देने के लिए फ़ोन किया होगा सोचकर मैनें फ़टाफ़ट तौलिया लपेटा और लपक कर फोन हाथ में लिया। ..

फोन स्क्रीन पर बुआजी का नाम फ्लैश हो रहा था...

बुआजी क्यूँ फोन कर रही हैं ? ...उठाऊ की न उठाऊ....

...सोचने-सोचने में फोन कट गया।

बुआजी का फोन कटना अच्छी बात नहीं है। अब इस बात की शिकायत ये पापा से करेंगी और मुझे शिष्टाचार का सबक सिखाया जाएगा।

मैनें बुआ को फिर फोन मिलाया। पहली घंटी गयी भी नहीं थी कि मुझे उधर से बुआजी की आवाज़ सुनाई दी

" फोन क्यों नहीं उठता तेरा ? क्या करता रहता है ? "

"ऑफिस में था , काम में बिज़ी था बुआजी , बताओ। "

" हमारे लिए इतना बिज़ी मत रहा कर। और ऑफिस से छूटा नहीं क्या अभी ? "

"हाँ फ्री हो गया, ट्रैफिक में था इसलिए फोन की घंटी सुनाई नहीं दी बुआजी, आप बताओ कैसे याद किया ? "

" याद नहीं फोन किया है तुझे ! "

" हाँ बुआजी बताओ क्यों क्या हुआ? "

" बस ऐसे ही याद कर लिया, तू तो करता नहीं है! "

" बुआजी अभी तो अपने कहा याद नहीं कॉल किया है ? "

" ज़्यादा पढ़ लिया लगता है तू !"

अब तक बुआ संवेदनाओं और शिकायतों का जाल बुन कर मेरे व्यवहार को काबू में कर चुकी थी।

" अच्छा सुन, चिंकू आया है दिल्ली , वो IAS की तैयारी करने कोचिंग सेंटर का पता कर रहा है। तेरे फूफाजी भी हैं साथ में। वापसी की ट्रेन छूट गयी तो तेरे पास आ रहे हैं रात को रुकने , ठीक है ना... हैलो सुन , हैलो। ....आवाज़ आ रही है क्या ? "

कानों में तो बुआजी की आवाज़ जा रही थी, पर मेरे गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। आधे घंटे बाद मुक्तेश्वर की बस थी।

'' अरे बोल न। चल ठीक है, वो दोनों अभी एक घंटे में तेरे पास पहुँच जायेंगे। तेरा एड्रेस मैं भाईसाब से ले लुंगी। ठीक है, रखती हूँ। और कभी फोन उठाकर नमस्ते भी कर लिया कर, सीधा काम पूछता है मेरे से , अरे माँ -बाप को बच्चों से क्या काम होगा ? बस तुम लोग मिल लिया करो। और जयपुर कब जाएगा घर वालों से मिलने ? अब तो काफी टाइम हो गया होगा तुझे घर गए। कब पिछले हफ्ते गया था। अच्छा ठीक है रखती हूँ। सुन चिंकू को 15 अगस्त वाले दिन लाल किला और परेड दिखा देना। होने वाले IAS अफसर का भाई है तू। "

अगर 40 हज़ार की जगह 4 हज़ार का फोन होता तो मैं उसे दीवार पर फेंक के मारता।

ये बुआजी -फूफाजी और चिंकू ने मेरा पूरा प्लान चौपट कर दिया। अब बुआ को ये भी नहीं बोल सकता कि घूमने जा रहा हूँ। नहीं तो बात मम्मी-पापा तक पहुंचेगी और वो सुनाएंगे कि यूँ तो बिना काम के छुट्टी लेके यहाँ-वहाँ डोल लेता है पर जयपुर आके घर वालों से मिलने आने के लिए ऑफिस वाले तुझे छुट्टी नहीं देते। मेरे घर वाले पहले भी अपने कटाक्षों के बाणों से मेरी इच्छाओं बींधते आये हैं। तो मैं अपने जीवन में और कोई तीर लेने को तैयार नहीं था।

रात को फूफाजी के खर्राटों ने सोने नहीं दिया और सुबह 5 बजे चिंकू ने चाय बना ली।

"पहले लाल किला चलते हैं , वहाँ पर परेड देख के , प्रधान मंत्री का भाषण सुनके, परांठे वाली गली से नाश्ता कर लेंगे, फिर शाम का सोचेंगे ! क्यों भाई ? "

"कितने टाइम से प्लान कर रहा तू ये सब देखना ? " उनींदी हालत में मुझे चिंकू के मुँहफ़टपने पर बहुत गुस्सा आ रहा था।

" मेरा तो प्लान किया हुआ ही था, मम्मी आपको पहले फ़ोन करके हमारे यहाँ के बारे में बताना भूल गयी थी। "

"अच्छा तो इसलिए एकदम से याद कर लिया बुआजी ने मुझे। "

"याद नहीं किया भैया कॉल कर लिया , चलो चलें। "

चांदनी चौक तक मेट्रो से पहुँचने के बाद स्टेशन से हमनें रिक्शा कर लिया। पुरानी दिल्ली की रंगीनियत बंद ऑटो में छुप कर नहीं देखी जा सकती।

रास्ते में स्कूल के बच्चे दिख गए तो चिंकू के ज्ञान का पिटारा खुल गया....

" भैया स्कूल के बच्चों से बढ़िया 26 जनवरी और 15 अगस्त कोई नहीं मना सकता । स्कूलों में 15 अगस्त की तैयारी जुलाई के महीने से ही शुरू हो जाती है। पीटी-परेड से ले के फैंसी ड्रेस,नाच-गानें और प्रतियोगिताएं, और इस दिन तो बैग भी नहीं ले जाना होता। तो डबल मस्ती।"

बात सुनकेअपने स्कूल की याद आ गयी। वाकई में 15 अगस्त स्कूलों में पिकनिक की तरह मनाते हैं | मेरे वक़्त में स्कूल टीचर खुशमिजाज़ बच्चों के झुंड को मनोज कुमार के देशभक्ति गानों पर कमर हिलाना सिखाते थे ,और ज़िम्मेदार बच्चे परेड टीम में शामिल होते थे, जहाँ उन्हें ड्रम की बीट पर एक साथ कदम बढ़ाना सिखाया जाता था | फैंसी ड्रेस में कोई बच्चा चाचा नेहरू की तरह कोट में गुलाब फँसाए स्टेज पर खड़े होता था , तो कोई बच्ची साड़ी लपेटे भारत माता बनती थी। मुझे सबसे बढ़िया तो वो बच्चा ही लगता था जो एक हाथ से लाठी घसीटते और दूसरे हाथ से कूल्हों पर लिपटी धोती संभालता बापू बनके आता था । उसे कभी इनाम नहीं मिला था। अब बड़ा होकर समझ गया होगा कि लोग बापू के किरदार से ज़्यादा तवज्जो नीले-सलेटी -नारंगी रंग के कागज़ पर बनी उनकी तस्वीर को देते हैं। पता नहीं कितनी उम्र में उसने भी धोती फेंक कर कोट-पेंट खरीद लिया होगा।

सोचते सोचते लाल किले पर पहुँच गए। मंच की तरफ मुंह करके पीछे सीटों पर बैठ गए।

" भैया 15 अगस्त 1947 की सुबह इसी जगह से भारत के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आज़ाद भारत के आज़ाद लोगों के सामने अपना पहला भाषण दिया था। अब यहाँ एक के बाद एक इतनी चीज़ें होंगी कि समझ ही नहीं आएगा। "

" आसान शब्दों में समझा क्या होगा अब ? " मैनें चिंकू से पूछा

देखो भैया सेना की टुकड़ियाँ सलामी देंगी और भारत का प्रधानमंत्री लाल किले से झंडा फहरा कर लोगों के जमघट और मीडिया के आगे भाषण देगा | बताएगा कि हमारा प्रजातंत्र कितना मज़बूत है, कितने सालों से चला आ रहा है, भारत की सभ्यता कितनी पुरानी है और उसके कार्यकाल में क्या-क्या सुखद बदलाव आए हैं | "

" तू ये देखने दिल्ली आया ? "

" यही नहीं भैया अभी परांठे वाली में नाश्ता और फिर जामा मस्जिद की फिरनी भी खानी है । चलेंगे यहाँ से फ्री होके। "

लाल किले से फ्री हो कर चिंकू फूफाजी और मुझे परांठे वाली गली ले गया। काफी हफ्ते प्लानिंग की थी शायद इसने। तभी जीपीएस से फ़टाफ़ट रास्ते ढूंढ रहा है लौंडा।

जामा मस्जिद के आगे फिरनी खाते हुए चिंकू खुद ही सवाल पूछ कर खुद ही जवाब दे रहा था ..

" भैया बताओ आज के दिन और क्या हुआ था ? छोड़ो मैं बताता हूँ। 15 अगस्त 1947 को भारतवर्ष की 400 से ज़्यादा शाही रियासतें भारत में मिल गयी थी। शाम को इंडिया गेट पे इसकी स्टोरी बताएँगे। चलेंगे,ठीक है ! "

" मैं तुझे घुमा रहा हूँ या तू मुझे घुमा रहा है?"

" एक ही बात है भैया , आप मुझे दिल्ली और मैं आपको इंडिया घुमा रहा हूँ । "

शाम को चिंकू और फूफाजी के साथइंडिया गेट जाना हो गया, जहाँ लाइट एन्ड साउंड शो चल रहा था। कई सारे जवान लड़के- लड़कियाँ अपनी गाड़ियों की सनरूफ से निकल कर आज़ाद हवा का पूरा मज़ा ले रहे थे।

शाम को चिंकू और फूफाजी को ट्रेन में चढ़ाते हुए फूफाजी ने हाथ में 2 हज़ार रुपये रख दिए।

" ये किसलिए ? "

मुझे एक तरफ करके बोले- "तेरे घूमने फिरने के लिए हैं। वीकेंड पर तेरा प्लान कोई परेड देखने का मूड थोड़ी होगा। वो तो तेरी बुआ चिंकू को इतने बड़े शहर में पहली बार अकेले नहींआने दे रही थी , नहीं तो मैं खुद ऑफिस के दोस्तों के साथ लॉन्ग वीकेंड में जैसलमेर जाता ।"

मैनें लपक के पैसे जेब में डाले और मुक्तेश्वर का प्लान अगले हफ्ते पर शिफ्ट कर दिया।

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