puri : jahaan sakshaat bhagwaan baste hain

Tripoto

हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र तीर्थस्थल पुरी को जगन्नाथ (ब्रह्मांड के भगवान) पुरी के रूप में भी जाना जाता है| उड़ीसा भगवान जगन्नाथ के मंदिर के लिए पूरे भारत में मशहूर है | हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार पुरी भगवान विष्णु का विश्राम स्थल है।

पुरी में भारतीय, ख़ास कर उड़ीसा की कला और वास्तु का भंडार है | कोणार्क, भुवनेश्वर और पुरी मिलकर उड़ीसा का गोल्डन ट्राईएंगल बनाते हैं | इन तीनों जगहों की ऐतिहासिक विरासत और तीर्थ स्थल काफ़ी सराहनीय है और पुरी में सबसे ज़्यादा सैलानी आते हैं |

सलाह

खुद के सामान की देखभाल करें।

रात 8 बजे के बाद समुद्र तट पर ना जाएँ |

समुद्र तट पर खाने की स्टालों पर कुछ भी खाने से बचें।

किसी भी मंदिर के पंडों से दूर रहें।

किसी भी जीवित मंदिर के अंतरतम गर्भगृह में प्रवेश ना करें |

बंदरों से दूर रहें व उन्हें भोजन और अन्य सामान का लालच न दें।

इतिहास

पुरी के आश्चर्यजनक इतिहास में पौराणिक कहानियों और तथ्यों का ज़बरदस्त मेल देखने को मिलता है | पुरी पुराने समय में पूर्वी और दक्षिणी भारत को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण स्थल था|

पूरी में गोवर्धन मठ है जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किए हुए चार मठों में से एक है | बाकी चार शृंगेरी, द्वारका और ज्योतिर्मठ या जोशीमठ में हैं | हुआन त्सांग के अनुसार पुरी को पहले चारित्र के नाम में जाना जाता था। हालांकि इस तथ्य के बारे में कुछ भी ठोस रूप नहीं कहा जा सकता है। इतिहासकारों का तो यह भी मानना है कि इस जगह को पुरुषोत्तम मंदिर (जिसे आज जगन्नाथ मंदिर भी कहते हैं) होने की वजह से पुरुषोत्तम क्षेत्र भी कहा जाता था | ये मंदिर चोगन्गा देव के शासन काल में बनवाया गया था |

सन 1135 में जब पुरुषोत्तम मंदिर की स्थापना की स्थापना हुई, उसके बाद से 12 वीं शताब्दी के दौरान पुरी को एक धार्मिक केंद्र का दर्जा मिला | कहते हैं सन 1107 से 1117 तक प्रसिद्ध संत रामानुज यहाँ रहे थे | गंगा वंश का यहाँ सबसे लंबे शासनों में से एक रहा है |

15वीं शताब्दी में मुगलों ने भी इस जगह पर अपना राज घोषित कर दिया था | पुरी के इतिहास में अफ़ग़ानों का भी ज़िक्र आता है जिन्होने इस मंदिर को तबाह करके खंडहर में बदल दिया था | ब्रिटिश राज के हाथ में राज जाने से पहले यहाँ मराठा साम्राज्य का शासन रहा जिन्होने फिर से इस मंदिर का निर्माण करवाया | ब्रिटिश राज के दौरान मंदिर का रखरखाव पुरी का राजा करता था |

सन 1948 में पुरी को उड़ीसा का भाग घोषित कर दिया गया |

संस्कृति

पुरी को उड़ीसा की सांस्कृतिक राजधानी भी कहते हैं | पुरी में पुराने हिन्दुस्तान और पारंपरिक हिंदू धर्म की सांस्कृतिक धरोहर दिखती है | यहाँ के ऐतिहासिक मंदिर और पवित्र अनुष्ठान धार्मिक सैलानियों को एक ज़िंदगी भर याद रखने लायक अनुभव के लिए पुरी आकर्षित करते हैं |

कहाँ ठहरें

पुरी में दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं इसलिए पहले से ही यहाँ कमरा बुक कर लेना चाहिए | गर्मियों में यहाँ साइलाईयों की तादात बढ़ जाती है | वैसे देखा जाए तो पुरी साल भर जया जा सकता है |

हनीमून मनाने वाले जोड़ों से ले कर विद्यार्थियों तक सभी प्रकार के सैलानियों को पुरी में रुकने के लिए होटलों के बढ़िया पैकेज मिल जाते हैं | 1000 से 1500 रुपये में आपको दो लोगों के लिए कमरा मिल जाएगा | मंदिर के पास स्थित होटल ज़्यादा किराया वसूल करते हैं | गर्मियों में वातानुकूलन सिस्टम की ज़रूरत पड़ती है |

पुरी

भुवनेश्वर हवाई अड्डे / भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन / पुरी रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के बाद हमें पूरी के समुद्रतट पर बने मेफेयर बीच रिसॉर्ट में ले जया गया | भुवनेश्वर से पुरी की दूरी मात्र 60 किलोमीटर है। रिज़ोर्ट पहुँचने तक हम बहुत थक गए थे इसलिए होटल में चेक इन करते ही आराम किया। होटल में रात भर चैन से सोने का आनंद लिया।

श्री जगन्नाथ मंदिर

सुबह होने पर पता चला कि होटल वालों ने एक पंडे (जगन्नाथ मंदिर का पंडित) की पहले ही व्यवस्था कर दी है | वो हमें जगन्नाथ मंदिर और मार्कंदेश्वर मदिर की ओर ले गया | इन मंदिरों की शांति की तुलना नहीं की जा सकती | सुबह सुबह की आरती के बाद हम सड़क के किनारे खरीदारी करने निकल गये | रात के भोजन में हमने जगन्नाथ प्रभु का महाप्रसाद ग्रहण किया और फिर होटल में आराम करने चले गये |

चिलिका झील

नाश्ते के बाद हमें वापसी के लिए भुवनेश्वर हवाई अड्डे / भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन / पुरी रेलवे स्टेशन आना था | होटल से चेक आउट करने के बाद हम सतपाड़ा में चिलिका झील (खारे पानी की सबसे बड़ी झील) पर पहुँच गये | वहाँ से नाव में बैठ कर इरावाडी डॉल्फ़िन और राजहंस द्वीप की ओर निकल पड़े | सी माउथ, पक्षी अभयारण्य और डॉल्फिन पार्क की नाव द्वारा यात्रा लगभग 5 घंटे का समय लेती है। जैसे ही हमने यहाँ की यात्रा पूरी की, वापसी के लिए हम लौट चले |

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