सोलो बाइक ट्रिप पर टायर पंचर हुआ और मिल गया घुमक्कड़ साथी!

Tripoto
Photo of सोलो बाइक ट्रिप पर टायर पंचर हुआ और मिल गया घुमक्कड़ साथी! by Rishabh Dev

जिंदगी की धक्कमपेल और ऊबाऊपनी जिंदगी में मोटिवेशन के लिए क्या होना जरूरी है? मेरे ख्याल से थोड़ा पागलपन। ये पागलपन ही तो होता है जो कुछ करने का जज्बा देता है। घूमते-घूमते जब मैं कहीं रूकता हूँ तो अपने पुराने दिनों को याद करता हूँ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऐसे ही अनजान पगडंडियों पर अकेला चलूँगा। मैं हर बार कुछ नए अनुभवों को बटोरता हूँ, जो कई बार बहुत अच्छा होता है तो कई बार डरावना। मैं एक बार फिर से कुछ नया करने के लिए निकल पड़ा था, साथ में थी मेरी बाइक और जगह थी, उत्तराखंड

मैं पहली बार बाइक से सोलो ट्रैवल कर रहा था। मेरे लिए उत्तराखंड जाना-पहचाना था लेकिन इन घुमावदार सड़कों पर मोटरसाइकिल चलाना सबसे कठिन होता है। उस पर आपकी बाइक पंचर हो जाए तो क्या ही कहने? उसी एक पंचर ने मुझे वो अनुभव दिया जो शायद ही कभी ले पाता। पहाड़ पर एक कच्चे घर में रात बिताना, उत्तराखंडी खाना और उस हंसमुख मिजाज लड़के से मिलना, जिसके साथ मैं उत्तराखंड की कई खूबसूरत जगहों को देखने वाला था। जो मेरा अब तक का सबसे बेहतरीन अनुभव है।

मैदान से पहाड़ की ओर

मैं एक दिन दिल्ली में अपने ऑफिस में बैठा हुआ था, मैंने कहीं जाने का प्लान तो बना लिया था लेकिन जाने वाली जगह के बारे में सोच रहा था। तभी अचानक ख्याल आया कि क्यों ना इस बार पहाड़ों में बाइक से जाया जाए? कुछ दिनों बाद मैं दिल्ली से देहरादून वाली बस में बैठा था। देहरादून से अपने दोस्त की बाइक से पहाड़ों में जाने वाला था। रात के इस सफर में मैं एक अच्छी नींद लेना चाहता था जिससे अगले दिन बाइक चला सकूँ। मैं सुबह-सुबह देहरादून में ठंडी हवा का एहसास ले रहा था। दिल्ली से बाहर निकलने पर लगता है कि ज़िंंदगी अब शुरू हुई और मैं तो पहाड़ों की गोद में आ गया था। यहाँ तो सफर भी जिंदगी है और ठहरना भी।

कुछ घंटे देहरादून में बिताए और निकल पड़ा पहाड़ों की ओर। देहरादून से मैं देवप्रयाग की ओर बढ़ रहा था। देवप्रयाग में रूककर भागीरथी और अलकनंदा का संगम देखा। दोनों मिलकर एक नया नाम देती हैं, गंगा। देवप्रयाग से कुछ किलोमीटर आगे बढ़ा तो लगा कि गाड़ी थोड़ी भारी हो रही है। उतरकर देखा तो पिछले पहिये की हवा निकल चुकी थी। मैं पहली बार बाइक ट्रिप पर था इसलिए मुझे अंदाज़ा नहीं था कि ये सब भी हो सकता है। मैं ऐसी जगह खड़ा था जहाँ से देवप्रयाग और रूद्रप्रयाग की दूरी बराबर थी। अब मैं पीछे जाना नहीं चाहता था और आगे बढ़ नहीं पा रहा था। मैंने रात रूद्रप्रयाग में बिताने का सोचा था और शाम तो यहीं हो गई थी। गाड़ी गुजर रहीं थीं लेकिन मदद कोई नहीं कर रहा था। मैं गाड़ी धकेलते-धकेलते काफी आगे निकल आया था, अब तो अंधेरा भी होने जा रहा था। ऐसे में डर लगना लाज़मी है।

मिला घुमक्कड़ साथी

तभी सामने से मेरी ही उम्र का एक लड़का नज़र आया। मैंने उसे रोका और अपने हालात के बारे में बताया। उसने मुस्कुराकर कहा, परेशान मत होइए। पास में ही मेरा घर है, अगर आप चाहें तो मेरे घर चल सकते हैं। मैं तो अंधेरे में एक ठिकाना चाहता था, इसलिए मैंने फौरन हाँ कर दी। रास्ते में मैंने उसे अपने बारे में बताया और उसने अपने बारे में। उसने अपना नाम नूतन बताया और सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है और रोज़ी-रोटी के लिए होटल खोला है। करीब आधे घंटे के बाद हम एक घर के सामने खड़े थे। उस पहाड़ी पर कुछ घर थे, उन्हीं मे से एक के बाहर ही कुर्सियों पर हम बैठ गए। आवाज़ सुनकर घर से एक बूढ़े शख्स निकले, जिनके सिर पर उत्तराखंडी टोपी थी। वो, नूतन से अपनी पहाड़ी बोली में कुछ बात कर रहे थे।

नूतन कहीं चला गया और वो बुजुर्ग शख्स मेरे पास आकर बैठ गए। मुझे नए लोगों से बात करना बहुत करना बहुत पसंद है। उन्होंने बताया कि विकासनगर के पास हय्या गाँव के रहने वाले हैं। यहाँ जो घर देख रहे हो, सभी मेरे ही परिवार के हैं। रोजगार के लिए हम यहाँ चले आये, उनकी बोली जौनसारी है। ये लोग आज भी अपनी परंपरा को चला रहे हैं, थोड़ी देर बाद नूतन भी आ गया। नूतन अपने साथ एक पंचर वाले को लेकर आया हुआ था। नूतन ने बताया ये बाइक सही करके सुबह दे जायेगा। मैंने उसे गाड़ी दे दी, मुझे इस फैमिली से बात करना बहुत अच्छा लग रहा था। मैंने अभी तक नहीं बताया था कि मैं बाइक से कहाँ जा रहा था? वैसे तो मुझे भी नहीं पता था कि मैं कहाँ तक जाउँगा? मैंने तो सोचा था कि जहाँ तक मन करेगा जाऊँगा और जब लौटने का मन करेगा तो वापस आ जाउँगा।

निकल पड़े एक खूबसूरत सफर पर

तब मैंने नूतन से पूछा कहाँ जाना चाहिए? उसने कहा, आप तीर्थयात्रा तो करने आए नही हो तो आपको उत्तराखंड के छोर तक जाना चाहिए। मैंने उससे यूँ ही पूछ लिया, तुम चलोगे मेरे साथ, मुझे यहाँ के बारे में ज्यादा अंदाज़ा नहीं है। कुछ देर सोचने के बाद वो तैयार हो गया और मैं उसकी पैकिंग करवाने लगा। मैं खुश था कि अब मुझे अकेले ये सफर नहीं करना पड़ेगा। उससे भी बड़ी बात मेरे पास एक स्थानीय फ्रेंड था, जिसके साथ प्रॉब्लम आराम से हल हो जाती। अगले दिन सुबह-सुबह मैं एक नए साथी के साथ एक नए सफर पर निकल पड़ा। इस शख्स से मैं कुछ घंटों पहले मिला था लेकिन एक रात ने हमारी बाॅन्डिंग काफी अच्छी कर दी थी। अब मैं एक अच्छे सफर पर एक अच्छे दोस्त के साथ जा रहा था, वो मेरा दोस्त भी और इस सफर का गाइड भी।

हमने उसी दिन 270 किमी. की दूरी तय की और पहुँच गए गोविंदघाट। नूतन ने बताया, यहाँ से हेमकुंड साहिब दूर नहीं है, जब यहाँ तक आ ही गये हैं तो चल ही लेते हैं। अब वो डाल-डाल और मैं पात-पात था। जहाँ वो कहता, मैं चल देता। हमने घंघरिया अपनी बाइक रखी और हेमकुंड साहिब के ट्रेक के लिए चलने लगे। हमने 14 किमी. का ट्रेक 5-6 घंटों में पूरा किया। बीच में हम थोड़ा आराम करते और फिर आगे बढ़ने लगते। नूतन को देखकर लग ही नहीं रहा था कि वो पहली बार ट्रेक कर रहा है, उसके सामने मैं नौसिखये की तरह था। हेमकुंड साहिब का ट्रेक हमारे लिए काफी मुश्किल था, बर्फ और ठंडी हवओं के बीच हम हेमकुंड साहिब पहुँचे। हेमकुंड साहिब का ट्रेक खतरनाक है लेकिन खूबसूरत भी बहुत है। रास्ते में बहुत सारे बुग्याल और बर्फ से ढंके पहाड़ देखते ही बनते हैं।

पहाड़ों के बीच फूल ही फूल

इसके बाद हमने खूबसूरती की ओर एक और कदम बढ़ा दिया। अब हम फूलों की घाटी की ओर जा रहे थे, यहाँ आने का भी आइडिया नूतन का ही था। मुझे तो अंदाजा भी नहीं था कि आसपास इतनी सुंदर घाटी भी। उसने ये भी बताया कि 2013 की आपदा में इसका सही रास्ता नष्ट हो चुका है, अब हमें वहाँ पहुँचने के लिए पहाड़ों से होकर गुजरना पड़ेगा। नूतन आगे था और मैं पीछे। कुछ पहाड़ हम चढ़े और कुछ उतरे तो सामने देखा एक पूरी घाटी सुंदर फूलों से भरी हुई है। हमने कई घंटे उस घाटी में बिताए और वापस गोविंदघाट की ओर चल पड़े जहाँ हमारी बाइक थी। हम जिस रास्ते से आए वो रास्ता भटकाने और डरावना था। दरअसल जंगल के बीच से कोई रास्ता ही नहीं था लेकिन जल्दी नीचे उतरने के लिए हम जंगल से होकर गोविंदघाट पहुँचे। थकान का सुरूर हम पर चढ़ा हुआ था, थकान उतारने के लिए हमने रात वहीं गुजारी।

अगले दिन सुबह-सुबह हम बाइक से बद्रीनाथ और माणा गाँव की ओर निकल गए। यहां आना सबसे अच्छे डिसीजनों में से एक निकला। यहाँ काफी उँचाई थी और उँचाई की वजह से सर्दीली हवा चल रही थी जिसकी वजह से बाइक चलाने में परेशानी हो रही थी। ये एक अलग तरह का अनुभव था, खूबसूरत और खतरनाक। जल्दी ही हम बद्रीनाथ धाम पहुँच गए और बद्रीनाथ के दर्शन किए। इसके बाद हम माणा गाँव की ओर बढ़ गए। माणा गाँव उत्तराखंड का आखिरी गाँव है, यहाँ हमने पूरे गाँव को देखा और वापसी के सफर पर निकल पड़ा। हम वापस लौटे और रूद्रप्रयाग के घर पर रूके, यहाँ से मुझे अकेले बढ़ना था अपने वापसी के सफर पर।

वापस आते हुए मैं अपने आते हुए सफर को याद कर रहा था। जब मेरी बाइक पंचर हुई थी और तब मदद करने के लिए आगे एक अनजान शख्स आया था। बाद में वही शख्स मेरा गाइड भी बन गया और सफर का साथी भी। सफर तब और खूबसूरत हो जाता है जब ऐसे साथी सफर में मिल जाते हैं। वो सफर मेरे कुछ चुनिंदा यात्राओं में से है जिन्हें मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा।

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