भूतों के भानगढ़ में बिताई वो एक रात ज़िंदगी भर याद रहेगी!

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Photo of भूतों के भानगढ़ में बिताई वो एक रात ज़िंदगी भर याद रहेगी! 1/1 by सिद्धार्थ सोनी Siddharth Soni

आज से 16 साल पहले की बात है | गर्मियों की छुट्टियों में मैं नानी के घर मस्ती कर रहा था | मामाजी रोज़ 2 किलो लंगड़ा आम घर लाते थे | दोपहर में हम बच्चे आधे आम चूस जाते थे और रात को बचे आमों का अमरस बनता था | उस वक़्त गाँव में बिजली का कोई भरोसा नहीं था | रसोई में गैस लालटेन हमेशा तैयार रखी जाती थी |

एक रात सारे परिवार वाले गाँव में किसी की बैठक में गए हुए थे | सभी बच्चों को घर के सबसे बड़े भाई के साथ छोड़ा था | सबसे बड़े भाई की उम्र - 15 साल | सबने मिलकर छुपन छुपाई खेलने का मन बनाया | मैं घर के सबसे पिछले कोने में बने भंडार घर में जाकर छुप गया | मुझे नहीं पता था कि ये रात सबसे लंबी होने वाली थी |

कुछ देर छुपे रहने पर भी जब किसी के पकड़े जाने की आवाज़ नहीं आई तो मुझे बड़ा अजीब लगा | मैं कमरे से निकल कर बाहर देखने उठा, तो पता चला कि भंडार के दरवाज़े मेरे भाइयों ने बाहर से बंद कर दिए हैं | इत्तेफ़ाक से उस पूरी रात बिजली गुल रही | गाँव के अंधेरे कमरे में बंद 10 साल के बच्चे को कैसा लगा होगा, ज़रा इसका अंदाज़ा लगाने की कोशिश करो | यूँ तो अंधेरे से सभी को डर लगता है मगर मेरे मन में अंधेरे का ख़ौफ़ उस दिन बैठ गया |

इस घटना के 16 साल बाद जब कुछ दोस्तों ने यूँ ही खाली बैठे भानगढ़ जाने का प्लान बनाया तो मैनें सोचा कि क्यों ना मैं भी साथ हो लूँ | भूत प्रेतों से तो वैसे भी डर नहीं लगता | कम से कम बोरियत तो ख़त्म होगी |

शाम 6 बजे एक ही मोटरसाइकल पर हम तीन दोस्त सवार होकर निकल पड़े भानगढ़ किले की तरफ |

भानगढ़ का किला जयपुर से करीब 90 कि.मी. दूर अलवर जिले में है | किले के दरवाज़े तक पहुँचने के लिए आपको नैशनल हाइवे 148 छोड़कर कच्ची सड़क पर 2 कि.मी. अंदर गाँव में जाना होता है |

Photo of भानगढ़ फोर्ट, Bhangarh, Rajasthan, India by सिद्धार्थ सोनी Siddharth Soni

यूँ तो किले के दरवाज़े शाम को सूरज ढलने के साथ ही बंद कर दिए जाते हैं, और अंदर जाने पर दंड देने का प्रावधान भी है मगर ऐसा कौन-सा काम है जो पैसे से नहीं हो सकता | भारतीय सर्वेक्षण विभाग का तैनात किया हुआ गार्ड गेट पर ताला लगा ही रहा था कि हम तीनों दोस्त वहाँ पहुँच गए | अंदर जाने की बात की तो गार्ड ने साफ मना कर दिया, लेकिन जब तीनों ने उसे कुल ₹150 दिए तो उसने खुशी-खुशी ताला खोल दिया | मोटरसाइकल बाहर खड़ी करके हम जैसे ही दरवाज़े के अंदर घुसे, गार्ड ने बाहर से दरवाज़ा बंद करके ताला लगा दिया |

"गार्ड साहब, ये क्या कर रहे हो?"

"पैसे अंदर जाने के लिए हैं, रात भर यहाँ बैठ के तुम्हारी चौकीदारी के लिए नहीं | तुम्हारे घर पर कोई नहीं होगा, मेरे घर में बच्चे इंतज़ार कर रहे हैं | "

इतना कहकर गार्ड ने अपनी साइकिल उठाई और सीटी बजता हुआ चला गया | एक तरफ सीटी की आवाज़ दूर जा रही थी और दूसरी तरफ किले का घुप्प अंधेरा मुँह फाड़े सबकुछ निगल जाने की तैयारी में था |

आँखें बंद करने पर भी इतना अंधेरा नहीं होता जितना हमारी खुली आँखों के सामने था | फ़ोन की फ्लैशलाइट के सहारे हम आगे बढ़ चले |

बाहर गेट से अंदर किले तक पत्थरों से बना एक संकरा रास्ता जाता है जिसके दोनों तरफ खंडहर हैं | ये खंडहर कभी यहाँ रहने वाले लोगों के घर हुआ करते थे | 17वीं शताब्दी में अकबर की सेना के जनरल माधो सिंह ने ये किला और गाँव बसाया था | कहते हैं सिंधिया नाम के एक तांत्रिक को भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती से प्यार हो गया था | उसने इत्र की एक शीशी को काला जादू करके राजकुमारी तक पहुँचवा दिया, जिसे लगाते ही राजकुमारी उसके प्यार में दीवानी हो जाती | मगर किसी तरह से राजकुमारी को ये बात पता चल गईऔर उसने तांत्रिक को मरवा दिया | मरने से पहले तांत्रिक पूरे भानगढ़ को श्राप दे गया और देखते ही देखते गाँव के 10,000 लोग जाने कहाँ गायब हो गये |

श्रेय: श्रेय: साद अख्तर

Photo of भूतों के भानगढ़ में बिताई वो एक रात ज़िंदगी भर याद रहेगी! by सिद्धार्थ सोनी Siddharth Soni

अंधेरे में घने जंगल से घिरी अंजान जगह पर खंडहरों के पास चलते हुए आपके दिल की धड़कन अपने आप बढ़ जाती है | खून में इतना एड्रेनलिन दौड़ने लगता है कि छोटी सी आवाज़ भी बम के धमाके जैसी लगती है | और ऐसे में पास पड़ी थैली हवा के सहारे उड़ने लगे तो दिमाग़ तर्क का साथ छोड़ देता है |

तीनों दोस्त एक दूसरे का हाथ पकड़े आगे किले की ओर बढ़ते गए | रास्ते में बड़े-बड़े पीपल के पेड़ों पर बंदर शोर कर रहे थे |

भानगढ़ के मेन गेट से किला लगभग 1 कि.मी. दूर है | ईंटों से बने इस 1 कि.मी.  के रास्ते के दोनों तरफ ही खंडहर हैं | रास्ता आपको सीधा किले पर ले जाता है, जहाँ जाते ही आपको पानी की आवाज़ सुनाई देगी | किले के नीचे एक छोटा तालाब बना है |

अंधेरे का डर, फिर पानी में खींच लिए जाने का डर हमें आगे बढ़ने से रोक रहा था | मगर मर्दानगी हमें पीछे मुड़कर भागने से भी रोक रही थी |

फिर सोचा यहाँ तक तो आ ही गए हैं, आगे बढ़ कर देखते हैं | जो होगा तीनों मिलकर साथ में निबट लेंगे |

तालाब के ऊपर संकरा सा पुल बना है | जैसे ही हमने पुल को पार किया, हमारे दाईं तरफ बड़े-बड़े मंदिर थे | ये किले का पूजाघर होगा, ऐसा हमने सोचा और मंदिरों की तरफ बढ़ गए | मंदिर में थोड़ा कम डर लगेगा, ऐसा हमने सोचा | सोचा कि भगवान के दरबार में बैठकर मन थोड़ा स्थिर होगा तो किले में और अंदर चले जाएँगे |

मंदिर परिसर में घुसते ही पता चल गया कि बहुत बड़ी भूल कर दी | मंदिरों में भगवान की मूर्तियाँ ही नहीं थी | बस बड़े-बड़े अंधेरे ढाँचे सूने पड़े थे | साँस की आवाज़ भी गूँज रही थी | मानों भगवान भी भानगढ़ से निकल कर भाग गए हों |

भानगढ़ में आज भी तांत्रिक टोने-टोटके करने आते हैं | मोबाइल के फ्लैश से देखा कि मंदिर परिसर में टूटी हुई चूड़ियाँ, सिंदूर और तेल के दीपक पड़े थे | दीवारों पर लाल सिंदूर से रानी रत्नावती का नाम लिखा हुआ था | ये सब देखकर किसी के भी खोपड़ी के बाल खड़े हो जाएँगे |

"घर चलें क्या? किले में घूमने का मन नहीं है| " एक दोस्त ने हम दोनों से पूछा | मैं तो मन-ही-मन हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था, तो मैनें तो सिर्फ़ हाँ में गर्दन हिलाई | हिम्मत बाँधे हम तीनों कदम साध कर चुपचाप मंदिर से बाहर निकल गए | तीनों में से किसी ने मुड़ कर भी किले की तरफ नहीं देखा | बस फ़ोन की फ्लैश लाइट के सहारे खंडहरों से होते हुए गेट की ओर चल पड़े | 1 कि.मी.  का रास्ता 1 योजन का लग रहा था |

हम तीनों में से कोई एक कदम भी पीछे रहना नहीं चाहता था, क्योंकि  हमने भूत की बहुत सारी फिल्में देखी हैं | जो सबसे पीछे होता है, वही सबसे पहला शिकार बनता है | इसलिए हम कंधे से कंधा मिला कर चल रहे थे | फिर भी कभी कोई तेज़ चलने लगता, कभी कोई | आधा रास्ता निकलने के बाद तो हम तीनों जैसे हल्की-हल्की जॉगिंग करने लगे |

जॉगिंग करते-करते गेट तक पहुँच गए, मगर गेट पर तो ताला लगा था | 25-30 फीट ऊँचे भारी लोहे से बने पुराने गेट को कूद कर निकलना आसान नहीं था | गेट के ऊपर लोहे की कीलें भी निकली थी | ऐसा लग रहा था, जैसे किले से निकलने के सारे रास्ते बंद से हो गए थे | हिम्मत भी जवाब दे रही थी | गेट तक पहुँच कर बाहर ना निकल पाना ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने हमें बिना जुर्म के जेल में क़ैद कर रखा हो | और इस जेल में हमारे साथ आत्माएँ भी रह रही थी |

श्रेय: देबज्योति बेनर्जी

Photo of भूतों के भानगढ़ में बिताई वो एक रात ज़िंदगी भर याद रहेगी! by सिद्धार्थ सोनी Siddharth Soni

तो हम तीनों ने जेल से निकल भागने के उपाय सोचना शुरू किया | तीनों सोच ही रहे थे, कि एक दोस्त को ना जानें क्या सूझी, उसने घबराहट में ताले पर लात मार दी | उसका पैर ताले से टकराकर ज़ंजीर पर से फिसलता हुआ गेट के सरियों में फँस गया | अब दोस्त का पैर गेट से बाहर था, और शरीर भानगढ़ में | पूरी तरह फँस चुका था | वो सरिया पकड़कर जैसे-तैसे पैर छुड़ाने की पूरी कोशिश में लगा था, और हम दोनों का हंस-हंस के हाल बुरा हो गया | पूरे भानगढ़ में हमारी हँसी गूँज रही थी | गूंजने से दो आवाज़ें हज़ारों आवाज़ों में बदल गयी, और हमें याद आया कि इस अपशगुनी जगह से निकलना ज़रूरी है | दोस्त का पैर आज़ाद करवाने के बाद हमने बड़े ध्यान से गेट कूदने का मन बनाया | मगर अब सवाल ये था कि कौन पहले कूदेगा और कौन आख़िर में | ज़ाहिर है, आख़िर में जाने के लिए हम तीनों में से कोई तैयार नहीं था | तो हमने सोचा कि एक साथ चढ़ते हैं |

सेना के कमांडो की तरह हमने गेट कैसे फाँद लिया पता नहीं, मगर जैसे-तैसे हम दूसरी तरफ कूद गए | मोटरसाइकिल में चाबी घुमाई, और लपक के बैठे | फिर भानगढ़ के गेट से ऐसा फुर्र हुए कि सीधा हाइवे पर रात को खुली चाय की दुकान पर की बाइक रोकी |

चाय पीते हुए हमने एक दूसरे की तरफ देखा | गेट में फँसने से किसी की टी-शर्ट में छेद हो गया था तो किसी की हथेली से खून बह रहा था |

"तेरी फटी, तेरी फटी " कहकर एक-दूसरे का मज़ाक तो उड़ा रहे थे, मगर मन में सबको पता था कि सब बहादुरी का ढोंग कर रहे थे |

चाय वाले ने बताया कि भानगढ़ के किले में सुबह से शाम तक लोग पिकनिक मनाने आते हैं और शाम होते ही चले जाते हैं | पीछे छूट जाता है काफ़ी सारा खाने का सामान और फलों के छिलके आदि, जिनमें मुँह मारने कई बार भानगढ़ के पास घने जंगलों से तेंदुए, जंगली कुत्ते और काले भालू तक किले में आ जाते हैं | कई बार तो किले के गेट का गार्ड भी हमले का शिकार हुआ है | फिर उसने बताया कि भानगढ़ के पास ही सरिस्का टाइगर रिज़र्व के जंगल हैं, जहाँ से तेंदुए, भालू, और जंगली कुत्ते ही नहीं, बल्कि बाघ भी रात में किला परिसर में आ धमकते हैं| गाँव में कई बार शेर की दहाड़ सुनी गयी है | इतना सुनना था कि हम तीनों एक-दूसरे के मुँह की तरफ देखने लगे | भूतों से ज़्यादा ख़तरा हमें जंगली जानवरों से था |

ऐसा नहीं है कि इस घटना के बाद अब अंधेरे से डर नहीं लगता | अगर कहीं अंधेरा है तो डर अपने आप लगने लगता है | मगर अब किसी कुख्यात इलाक़े में जाने से पहले उसके बारे में सबकुछ पढ़ने की आदत ज़रूर पड़ गयी है |

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