शाम-ए-बनारस: एक ऐसा अनुभव जिसके बिना आपका सफर है अधूरा!

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Photo of शाम-ए-बनारस: एक ऐसा अनुभव जिसके बिना आपका सफर है अधूरा! by Rishabh Dev

बनारस का ज़िक्र आते ही ये शहर हमारे मन में एक धुंधली-सी तस्वीर बना देता है। कम से कम ऐसा तब तक तो होता ही है, जब तक आप बनारस ना गए हो। बनारस की खूबसूरत और मनभावनी सुबह का ज़िक्र तो खूब मिलेगा, लेकिन बनारस की शाम के बारे में कम ही कहा गया है। बनारस की सुबह जितनी खूबसूरत होती है उससे कहीं ज़्यादा रंगीन होती है, शाम-ए-बनारस। जब गंगा के किनारे हरी-पीली रोशनी में नहाए घाटों को देखने का मौका मिले, गंगा के बहते पानी को देखनकर सुकून मिले तो ऐसी शाम को कौन नहीं देखना चाहेगा। बनारस की शाम को देखना वैसा ही है, जैसे किसी से इश्क करना। मैंने भी बनारस की शाम नहीं देखी थी, लेकिन जब देखी तो मन में यही आ रहा था कि ये शाम कभी खत्म ना हो।

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श्रेयः माउथ शट

कहते हैं ना जब जिंदगी सुस्त पड़ जाए, जब लगे कि जिंदगी ठहर-सी गई है तो कहीं चले जाना चाहिए। ऐसे ही एक दिन जब मैं ऑफिस में काम कर रहा था, तभी मेरे दोस्त का फोन आया। उसने कहा, घूमने चलोगे। मैंने जगह पूछी तो उसने बनारस का नाम ले लिया। उसने जगह तो अच्छी चुनी थी लेकिन मुझे अपनी छुट्टी भी तो देखनी थी। मैंने इस शहर के बारे में जाने कितना सुना था? मेरा एक दोस्त बनारस का था, जो मुझे वहाँ के बारे में बताता ही रहता था। वो बताता था कि सुबह-सुबह ही यहाँ की गलियों में घंटियों की आवाज़ पहुँचने लगती है। यहाँ के लोगों का अभिवादन ‘हर-हर महादेव’ से होता है। बनारस के घाटों की खूबसूरती का तो कोई सानी नहीं है। वो मुझे हर बार बनारस चलने को कहता लेकिन मैं कभी जा नहीं पाया। इस बार लग रहा था कि मेरी नसीब में बनारस देखना अब आया है।

अगली सुबह सूरज के निकलने से पहले ही मैं अपने दोस्त के साथ बनारस जाने वाली ट्रेन में था। मैंने ट्रेन से बनारस कई बार देखा था लेकिन कभी बनारस नहीं उतरा था। ट्रेन में बैठे हुए मैं सोच रहा था कि बनारस उतना ही सुंदर होगा जितना मैंने सुना है। वहाँ के अस्सी घाट, गंगा, शाम की भव्य आरती और तंग गलियों की चहचहाहट, पता नहीं ये रोमांच बहुत दिनों बाद घूमने की वजह से थी या बनारस की वजह से। कुछ घंटों में नींद आ गई और जब आँख खुली तो पता चला कि थोड़ी देर में ही बनारस जंक्शन आने वाला था। हम भी इस शहर को देखने के लिए पूरी तरह से तैयार थे।

मुस्कुराइए आप बनारस में हैं

थोड़ी देर में हम बनारस में थे, ऑटो से होटल की ओर जा रहे थे। सड़क अच्छी ही थी, मैं जिस रास्ते से जा रहा था उस रास्ते में गड्ढे नहीं थे। हालांकि हर बड़े शहर की तरह ट्रैफिक की समस्या यहाँ भी थी। अभी तक मुझे बनारस दिख रहा था लेकिन मुझे विश्व के सबसे प्राचीन शहर काशी को देखना था। होटल पहुँचा और तय किया कि थोड़ी देर बाद बनारस को देखेंगे। शाम होने वाली थी और मुझे शाम की आरती देखनी थी। बनारस आए और शाम की आरती ना देखी हो तो खाक बनारस देखा।

बनारस को देखना तो था लेकिन मुझे परेशानी थी तो बस इस गर्मी की। पता नहीं इस गर्मी में बनारस कैसा होगा? तय समय पर हम होटल से निकलकर गंगा के घाट पहुँच गए। हम गंगा को और इस प्राचीन सभ्यता के शहर को बीच गंगा में जाकर देखना चाहते थे। हम राजघाट गए, यहीं से हमें नाव पर चढ़ना था। गंगा किनारे कई लोग स्नान कर रहे थे और कई लोग पूजा कर रहे थे। बनारस के घाट पर ये दृश्य बहुत आम है। बनारस के घाट और लोगों को देखते हुए हम नाव पर चढ़ गए। जब मैं नाव पर चढ़ा तो कुछ बच्चे मेरे पास आये और गंगा की आरती करने के लिए दीपक खरीदने को कहने लगे। पहले तो मैंने मना कर दिया लेकिन उनकी मासूमियत देखकर मैंने एक दीपक खरीद ही लिया। दिल्ली में भी मेरे साथ ऐसा कई बार हो चुका है लेकिन वहाँ कभी कुछ नहीं खरीदा। शायद यही तो बनारस है जहाँ हर कोई आकर बनारस जैसा हो जाता है।

सुहाना मौसम और गंगा

नाव चल पड़ी। घाट और वो बच्चे हम से दूर होने लगे। नाव को नाविक चप्पू से चला रहा था। पास में कुछ और नावें भी थीं जो दिखने में नाव जैसी ही थीं लेकिन वे मोटरबोट थीं। इस तरह हम बनारस में एक नए सफर पर थे गंगा की सैर पर। गंगा की शांत आवाज़ और चारों तरफ मंदिर ही मंदिर, ये सब बेहद सुकून वाला था। शाम होने लगी थी और मैं केदारनाथ सिंह की कविता मन ही मन गुनगुना रहा था, ‘इस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है, धीरे-धीरे चलते हैं लोग, धीरे-धीरे बजते हैं घंटे, शाम धीरे-धीरे होती है’

शाम होने के साथ ही जो उमस चुभ रही थी, वो अब कहीं चली सी गई थी। बहुत ठंडी हवा तो नहीं लग रही थी लेकिन मौसम बहुत प्यारा और सुहावना था। जैसे-जैसे शाम होती गई ये खूबसूरत और बढ़ने लगी। गंगा के बीच से घाटों को देखना बहुत मनोरम था। नाविक इन घाटों के बारे में बताता जा रहा था। उसने ही दशाश्वमेध घाट को दिखाया, जहाँ कुछ देर बाद आरती होने वाली थी। इसके बाद मणिकर्णिका घाट भी देखा जहाँ हर वक्त चिता जलती रहती है। इसके अलावा गंगा से आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट, हरिश्चंद्र घाट, केदार घाट और तुलसी घाट को भी देखा। यहाँ से देखने पर ये शहर वाकई सबसे प्राचीन शहर लग रहा था। यहाँ के घाट, उस पुरानेपन की ओर ले जाता है जिनको हम बार-बार बस याद करते रहते हैं। यहाँ उस प्राचीन सभ्यता की झलक देखने को मिलती है।

सबसे खास गंगा आरती

चौरास्सी घाट देखने के बाद नाव वापस लौटने लगी। अब हमें वो देखना था जिसे देखने के लिए दुनिया भर से लोग काशी आते हैं, गंगा आरती। नाव दशाश्वमेध घाट पर पहुँच गई और हमारी नाव भी बाकी नावों के साथ सट गई। सामने से आरती देखने के लिए नावें सामने सट जाती हैं और पर्यटक वहीं से ही आरती देखते हैं। ऐसी ही एक नाव में हम भी सवार थे। सामने से आरती देखने का नज़ारा ही कुछ और है। अब बस आरती शुरू होने का इंतजार था। स्टेज पर भजन शुरू हो चुके थे और फिर शुरू हुई गंगा की भव्य आरती।

काशी के दशाश्वमेध घाट पर होने वाली इस भव्य गंगा की आरती का सौंदर्य देखते ही बनता था। आरती के शुरू होते ही यहाँ का माहौल बदलने लगता है, हवा में अलग-सी खूशबू फैलने लगती है। आरती के दीपक रोशनी बिखरने लगते हैं। मंत्रों के जाप से पूरा वातावरण अध्यात्मिक और श्रद्धा से भर जाता है। शंख की आवाज़ तो इतनी बुलंद थी कि पूरा वाराणसी इससे गूंज गया होगा। इस आरती को देखने दो प्रकार के लोग मुझे दिखाई दे रहे थे। एक जो इस आरती को आस्था और श्रद्धा के भाव से देख रहे थे, दूसरे जो कैमरों से इस दृश्य को, आरती को कैद कर रहे थे। बहुत सारे पर्यटक भी आपको इस आरती में दिख जाएँगे। जब आरती खत्म हुई तब तक शाम का अंधेरा और गहरा हो गया था।

शाम का आखिरी अक्स

श्रेयः स्टाॅकटर डाॅट नेट

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इस आरती के साथ ही ये शाम मस्तानी हो चली थी। लेकिन अब हमारे वापस लौटने का समय हो चुका था। नाव एक बार फिर से घाट से दूर होने लगी। अब हम वापस लौट रहे थे, बनारस अब एक अलग प्रकार से दिख रहा था। बनारस की रंगीन छटा देखने को मिल रही थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि बनारस मुझे एक दिन में इतनी खूबसूरती दिखा देगा। रात के अंधेरे को दूर करने वाली रोशनी रंगीन छटा के समान लग रहे थे। हर घाट अलग रंग की रोशनी से चमक रहा था और गंगा भी उसी रंग में बह रही थी।

गंगा के पानी पर फैली ये रोशनी इतना आकर्षण फैला रही थी कि मैं उसे देखते रहना चाहता था। कहीं नीली रोशनी थी तो कहीं लाल और संतरी। इन्हीं नजारों को देखते-देखते राजघाट आ गया, जहाँ से हम चले थे। बनारस की ये शाम कभी भूलने वाली शाम थी। जिंदगी में ऐसी शामें बहुत कम आती हैं। इस कुछ घंटों के सफर में ये शहर प्यारा लगने लगा था। यहाँ के घाट, यहाँ के लोग, आरती सब कुछ बेहद प्यारा है। तभी तो इस शहर के बारे में कहते हैं, ‘तुम इश्क-इश्क कहना, मैं बनारस कह दूँगा’

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