राजस्थान में बिताए 5 दिनों ने कैसे मुझे नास्तिक से आस्तिक में बदल दिया

Tripoto
Photo of राजस्थान में बिताए 5 दिनों ने कैसे मुझे नास्तिक से आस्तिक में बदल दिया 1/4 by लफंगा परिंदा

मेरा हमेशा से ये मानना रहा है कि मैं बहुत ही किस्मत वाला इंसान हूँ क्यूंकी मैं दिल्ली में पैदा हुआ और यहीं पला बढ़ा हूँ | किस्मत वाला इसलिए हूँ क्यूंकी दिल्ली एक से बढ़ कर एक सुंदर राज्यों जैसे पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सबसे ज़्यादा राजस्थान के नज़दीक है | राजस्थान क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य तो है ही साथ ही यह अपने विशाल रेगिस्तान और शाही भव्यता के कारण भी जाना जाता है | जब तक मैं स्वयं राजस्थान नहीं घूम कर आ गया, तब तक राजस्थान के बारे में मेरे पास जो भी जानकारी थी वो मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों द्वारा दी गयी थी जो अक्सर पूरे राजस्थान में फैले शानदार किलों और महलों, तरह तरह के स्वादिष्ट भोजन और धार्मिक स्थलों के बारे माइयन बातें किया करते थे | अब चूँकि मैं एक पैदाइशी मुसाफिर हूँ तो काफ़ी समय से मेरा मन राजस्थान घूम कर यहाँ की सभ्यता और संस्कृति को करीब से समझने का हो रहा था | और आख़िरकार साल के दिसंबर के महीन मे वो समय आ ही गया जब मैने मेरे दफ़्तर से तीन दिन की छुट्टियाँ ली और पधार गया राजस्थान में |

राजस्थान में घुसने के लिए ज़्यादातर दिल्ली के लोग जो रास्ता अपनाते हैं, मैने उस रास्ते से हटकर कुछ अलग रूट लेने का निर्णय लिया | मेरा कार्यक्रम था दिल्ली से पुष्कर, फिर अजमेर-जोधपुर और अंत में फिर से दिल्ली | मैने 24 दिसंबर की रात को दफ़्तर से छूटते ही पुष्कर जाने वाली बस की टिकट बुक करवा ली थी | और इस तरह से शुरू हुई मेरी राजस्थान यात्रा जिसने मेरी ज़िंदगी बदल कर रख दी |

पुष्कर - साक्षात निर्माता का निवास स्थान

Photo of राजस्थान में बिताए 5 दिनों ने कैसे मुझे नास्तिक से आस्तिक में बदल दिया 2/4 by लफंगा परिंदा
श्रेय : बीजॉआर्न

शनिवार की सुहानी सुबह को मैं पुष्कर पहुँच गया | पता लगाना था कि भारत के तीर्थों के राजा कहे जाने वाले तीर्थराज में आख़िर क्या घटित होता है | चूँकि इस शहर में सबसे जाना माना ब्रह्मा का मंदिर भी है इसलिए मेरे अंदर का नास्तिक ये मान कर बैठा था कि पुष्कर काफ़ी धार्मिक शहर होगा जहाँ मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की कतारें लगी होगी | लेकिन मुझे क्या पता था कि मैं सरासर ग़लत होऊँगा | पुष्कर में एक ठीक ठाक से होटल में प्रवेश करने के पहले ही मुझे इस शार की मस्त हिप्पी जैसी ऊर्जा महसूस हो गयी थी | हाथ मुँह धो कर जब मैं बाहर नाश्ता करने निकला तो मुझे एहसास हुआ कि ये शहर तो पश्चिमी सभ्यता के खुलेपन और भारतीय संस्कृति की गरिमा का एक अनोखा मिश्रण है | एक ओर जहाँ स्थानीय फेरीवाले पोहा पकौड़ी का ताज़ा गरमा गर्म नाश्ता बेच रहे थे, वहीं दूसरी ओर आधुनिक कैफ़े की कतारें इज़राइली, अंग्रेजी, अमेरिकी और ना जाने कहाँ कहाँ के व्यंजन परोस रही थी | ये देख कर मुझे काफ़ी आश्चर्य हुआ, पर मुझे क्या पता था कि ये तो बस शुरुआत है | मैने पुष्कर के बारे में में काफ़ी ग़लत सोच बनाई हुई थी |

पुष्कर में जहाँ मैं ठहरा हुआ था, वह जगह घाट के काफ़ी नज़दीक थी | इस कारण जब भी में चाहता था, अपने कमरे से निकल कर सीधा घाट पर पहुँच सकता था | मशहूर ब्रह्मा मंदिर भी इस घाट के दूसरे छोर पर मौजूद था , तो मेरे कमरे से निकल कर मंदिर तक पहुँचना भी बड़ा आसान था | हिंदू धर्म के त्रिदेवों में से एक भगवान का ब्रह्मा का सबसे बड़ा मंदिर होने के बाद भी यहाँ श्रद्धालुओं की कुछ ख़ास भीड़ नहीं थी | शायद क्रिसमस के आस पास का समय होने के कारण ऐसा रहा होगा | मंदिर के विशाल परिसर में बैठ कर महाभारत में उल्लेख किए हुए उन देवताओं के बारे में सोचने का मेरे पास खूब समय था जो इसी मंदिर में पनाह ले कर बैठे थे |

मैं अपने विचारों में खोया हुआ था ही कि अचानक मंदिर के एक पुजारी ने मुझे झकझोर कर वापिस धरातल पर ला पटका | उसे लगा कि शायद में अपना रास्ता भटक गया हूँ | तंद्रा टूटने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं पिछले दो घंटे से मंदिर परिसर में ही बैठा हूँ | नास्तिक होने के बावजूद ना जाने क्यूँ मैं उस मंदिर में घंटों बैठा रहा | शायद उस मंदिर के शांत माहौल में बात ही कुछ ऐसी थी |

पुष्कर ऐसी मस्त जगह है जहाँ आप कहीं भी बैठ कर स्थिर मान से मोक्ष की कामना कर सकते हो | अगर आप दोपहर में पुष्कर झील के किनारे घाट पर बैठे हो तो कई पंडित आप के पास आ कर आपके अपने और परिवारजनों के पापों के प्रायश्चित करने की खातिर पूजा करने में सहयोग देने का प्रस्ताव रखेंगे | मैने बहुत लोगों को ऐसी पूजा अर्चना करने के बाद खुशी खुशी वापिस जाते देखा है तो इतना यकीन तो मैं कर सकता हूँ कि विश्वास में दवा की ताक़त होती है | और पुष्कर जैसी जगह में तो विश्वास की कहीं भी कमी नहीं है | अगले दिन सवेरे ही मैने मेरा कमरा खाली कर दिया और मेरे अगले धार्मिक गंतव्य की बस पकड़ ली जो पुष्कर से मात्र 15 किलो मीटर की दूरी पर है और इस जगह का नाम है अजमेर |

जहाँ सूफ़ी संत बसते हैं

अजमेर

दोपहर तक अजमेर पहुँचने के बाद पहले मैने एक होस्टल में सामान रखा और फिर सीधा पहुँचा ख्वाजा मोइनुद्दीन हस्सन चिश्ती की दरगाह में जिन्हें लोग अजमेर शरीफ के नाम से भी नवाज़ते हैं | यहाँ के मुख्य बाज़ार की छोटी छोटी गलियों से होता हुआ रास्ता आप को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के मुहाने तक ले आता है | दरगाह पहुँचते ही आप को एहसास होता है कि शायद अजमेर इस दरगाह के आस पास ही बसा होगा | ये सच भी हो सकता है क्यूंकी पुष्कर शहर पुष्कर झील के आस पास बसा हुआ है| इस तर्क से देखा जाए तो दोनों शहरों में समानता दिख जाती है, चाहे मज़हब में कितना ही फ़र्क हो | एक ओर पुष्कर था जो अपनी ही सहज चाल में मस्त धीरे धीरे चल रहा था, वहीं दूसरी ओर अजमेर था जो पूरी ऊर्जा के साथ उठ कर दौड़ने को तैयार था | देखा जाए तो पुष्कर विशाल और दूर दूर तक फैला हुआ था मगर अजमेर एक लंबा चौड़ा शहर था | पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर में गिने चुने श्रद्धालुओं के कारण बड़ी शांति थी, वहीं अजमेर शरीफ की दरगाह में इतनी भीड़ थी के साँस तक लेने की जगह नहीं थी | मंदिर की सहजता को दरगाह के श्रद्धालुओं के उत्साह ने फीका कर दिया था | शायद इसी कारण से राजस्थान हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है, मैं अपने आप से बुदबुदाया |

संगीतकारों द्वारा गाइ जा रही भावपूर्ण क़व्वाली की मधुर आवाज़ पूरी दरगाह में गूँज रही थी | लोगों को जल्दी जल्दी आगे बढ़ाया जा रहा था मगर वो फिर भी खुश थे | आख़िर उन्हें ग़रीब नवाज़ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मज़ार का दीदार जो हो गया था | दरगाह के अंदर हर प्रकार के वर्गों के साथ समान व्यवहार किया जा रहा था | वर्गों के आधार पर भेदभाव दरगाह की दीवारों के बाहर ही छोड़ कर आना होता है | दरगाह में अमीर ग़रीब सब साथ बैठ कर ख्वाजा जी के दरबार में इबादत कर रहे थे | मैं भी साथ ही बैठ गया वो गाने सुनने जो मैं पहले कभी नहीं सुने थे |

मुझे इस्लाम धर्म की जो एक बात सबसे अच्छी लगती है वो यह है कि इस धर्म में मूर्ति पूजा का कोई प्रचलन नहीं है | आप सीधे एक परमात्मा का ध्यान करते हो और वहीं आप का सारा प्रयास केंद्रित होता है | दरगाह के अंदर श्रद्धालुओं के कोलाहल के बीच में भी मैं असीम शांति का अनुभव कर रहा था | ऐसा एहसास मुझे पहले कभी नहीं हुआ था | मैं शाम तक दरगाह में ही था | देखा जाए तो ये लगातार दूसरा दिन था जब मैं किसी धार्मिक जगह पर इतनी देर बैठा था | धीरे धीरे ही सही मगर राजस्थान का मुझ पर जादुई असर हो रहा था |

अजमेर शहर आना सागर झील के पास बसा हुआ है जो किसी कारणवश मुझे पुष्कर झील से ज़्यादा बड़ी लगी क्यूंकी जहाँ भी जाता था, ये झील मेरा साथ ही नहीं छोड़ती थी | सड़क किनारे की लज़ीज़ चाट खाने और इस छोटे से शहर में थोड़ा और घूमने के बाद मैने अपनी इस राजस्थान की यात्रा के अंतिम पड़ाव जोधपुर के लिए बस पकड़ ली |

जोधपुर- नीला शहर

ये नीला शहर काफ़ी भव्य दिखता है और इसका श्रेय जाता है यहाँ के महरानगढ़ के किले को | यह किला भारत के सबसे बड़े किलों में से एक है और तिस बार शाम के वक़्त इस किले की रोशनी देखते ही बनती है (जैसा की आप ऊपर दी गयी मुख्य तस्वीर में देख सकते हैं) |

मैं अपने आप को किस्मतवाला समझता हूँ कि मुझे रुकने के लिए काफ़ी वाजोब दामों में एक हवेली मिल गयी जिसे होटल में तब्दील किया गया था | इंटरनेट पर देखी गयी तस्वीरों के अनुसार इस हवेलीनुमा होटल की छत से महरानगढ़ के किले का बेहद विहंगम दृश्य देखने को मिलता है | खुशकिस्मती से तस्वीरों में जो भी देखा था वो सच निकला | इसके अवला कमरे भी इस शैली में बने हुए थे कि घोस्टे ही मुझे राजसी एहसास होने लगा | मुझे खुशी थी कि राजस्थान यात्रा के दौरान मेरी किस्मत से मुझे ठहरने के लिए बढ़िया होटल मिले | या शायद यही राजस्थान की मशहूर मेहमान नवाज़ी का एक हिस्सा है जिसमे राज्य के सारे होटल न्यूनतम किराया लेने के बावजूद बढ़िया तरीके से बने हुए और प्रबन्धित थे |

शाम तक मुझे ये पता चल चुका था कि तीनों शहरों में से सबसे अच्छा खाना जोधपुर में मिल सकता था | सच कहूँ तो खाना इतना बढ़िया था कि मैं यहाँ के मशहूर सरदार बाज़ार में स्ट्रीट फूड का ज़ायक़ा लेने निकल पड़ा | इतने सारे कुरकुरे और लज़ीज़ व्यंजन सस्ते दामों में मिल रहे थे कि मुझसे रहा ही नहीं गया | मैं तब तक बाज़ार में मिलने वाली नमकीन चीज़ें और भुजिया खाता रहा जब तक पेट ने मेरे आगे हाथ नहीं जोड़ दिए |

अगले दिन मैं महरानगढ़ के किले को अंदर से देखने पहुँच गया | किले को देखने का निश्चय मैने अपनी यात्रा के आख़िरी दिन किया था क्यूंकी मेरा मानना था कि यात्रा का अंत इस शहर के राजसी ठाट के प्रतीक को देख कर किया जाना चाहिए | और सच कहूँ तो मैं बिल्कुल निराश नहीं हुआ | यह किला के पहाड़ी के शिखर पर बना हुआ है और करीब पाँच वर्ग किलो मीटर के दायरे में फैला हुआ है | किले के अंदर पहुँचते ही ऐसा लगता है मानों यहाँ एक अलग ही दुनिया बसी हो- अंदर थे कैफे, रेस्तरां, गैलरी, दुकानें, प्रदर्शनियाँ, सामने प्रस्तुति देते पारंपरिक संगीतकार, मंदिर और निश्चित रूप से किले की भव्य वास्तुकला तो थी ही | एक बार में पूरा किला तो घूमा जा नहीं सकता तो मैने सोचा क्यूँ ना ज़्यादा चीज़ें जल्दबाज़ी में देखने की बजाय कुछ चीज़ें अच्छे से देखूं | किला बहुमंज़िला है जिसमे अनंत गलियाँ और गलियारे हैं, कई कमरे भी हैं जो अलग अलग कामों को ध्यान में रख कर बनाए गये थे | कुछ कमरे बाकी कमरों की तुलना में ज़्यादा सुसज्जित थे जिन्हे देख कर ये कहा जा सकता है कि किसी समय में इन कमरों में राजा और उनके अतिथियों के लिए मनोरंजन के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था| अन्य कमरे थोड़े ज़्यादा निजी थे, ये कमरे शायद सोने के लिए थे जहाँ आम लोगों का प्रवेश निषिद्ध था। किले की हर मंज़िल पर एक चीज़ सर्वव्यापी थी और वो थी युद्ध और हथियारों की विस्तृत प्रदर्शनी | इन्हे देख कर ये महसूस हो जाता है कि उस समय के राजा देवताओं जैसे ठाट बाट से रहते थे |

महरानगढ़ का किला इस यात्रा के दौरान देखे गये उन दो स्थलों जैसा था भी और नहीं भी जिसमे मनुष्यों को देवताओं का सा दर्जा दिया हुआ है | किले का क्षेत्रफल विशालकाय था और दर्शाई गयी दौलत अपार थी | र्म जोधा जिन्होने साल 1460 में इस किले का निर्माण करवाया था वो शायद भगवान ब्रह्मा के जैसा ही रसिया और शौकीन आदमी रहा होगा | यह सोच कर मुझे लगा कि राजस्थान मेरे जैसे नास्तिक व्यक्ति के लिए एकदम सही जगह है | भगवान आसमान में सितारों के परे नहीं बल्कि यहीं हम मनुष्यों के बीच रहते हैं | और राजस्थान में इन देवताओं की अलग अलग शक्ल में भव्य रूप से पूजा की जाती है | जब मैं दिल्ली लौटा तो दिल में एक विश्वास था और एक बार फिर से राजस्थान को गहराई से समझने वापिस आने का निश्चय था | जाने क्या दिख जाए |

डिसक्लेमर : यह आर्टिकल ट्रिपोटो पर नवंबर 2017 तक की जानकारी के आधार पर लिखा गया है | यात्रियों को अपनी यात्रा की योजना बनाते समय वर्तमान मौसम की स्थिति, समय, कीमतों को फिर से जाँचने की सलाह दी जाती है।

यह आर्टिकल अनुवादित है | ओरिजिनल आर्टिकल पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें |

Be the first one to comment