भारत के पहाड़ी इलाकों में बसे मंदिर जो आपको धर्म और आध्यात्म के और करीब ले कर जायेंगे

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पूरे भारत में ऐसे कई मंदिर हैं जो पौराणिक कथाओ के स्रोत हैं। मंदिरों की स्थापना और वहां की शक्ति में लोगों के विश्वास से जुडी हुई कई ऐसी कहानियां हैं जो दुर्गम क्षेत्रों में स्तिथ इन मंदिरों को ख़ास बनlती हैं। इन मंदिरों में ज्यादातर जाने वाले दो किस्म के लोग होते हैं। एक जो अपनी भक्ति की शक्ति के कारण किसी भी दुर्गम यात्रा पर निकल जाते हैं और पहुंच जाते हैं इन पहाड़ों पे। और कुछ वो लोग जिनको पहाड़ों से ही इतना लगाव होता है की बिना किसी उद्देश्य के घुमते हुए वे कई बार इन प्रतिष्ठित मंदिरों में जा पहुंचते हैं। आप चाहे इन में से किसी भी प्रकार के राहगीर हों पर आपको हमेशा ही इन मंदिरो से जुडी कहानियां आकर्षित करेंगी।

यहाँ मैंने एक सूची तैयार की है उन मंदिरों की जो की पहाड़ों के सुन्दर परिवेश में स्तिथ हैं और सालों से यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते आये हैं। इस आकर्षण का कारण कभी इन मंदिरों की विचित्र बनावट और कभी इनसे जुडी पौराणिक कहानियां होती है। बहरहाल कारण चाहे जो भी हो आप एक बार इन मंदिरों में ज़रूर जाएँ।

कैसे पहुँचें: मनाली से बस या टैक्सी के माध्यम से

हिडिम्बा मंदिर से जुडी पौराणिक कथा: माना जाता है की यह पौराणिक मंदिर उस जगह पर बना है जहाँ राक्षसी हिडिम्बी ध्यान करती थी। राक्षशी सुन कर आप चौक मत जाईयेगा। प्राचीन काल से ही 'राक्षस' शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए भी किया जाता है जो सभ्यता से दूर जंगलों में दूरस्त जीवन व्यापन करते आये हैं। महाभारत की कथा को देखा जाए तो हिडिम्बी नाम की यह राक्षसी का विवाह पांच पांडवों में से एक भीम से होता है। इस विवाह से पूर्व भीम हिडिम्बी के भाई हिडिम्बा को एक युद्ध में पराजित भी करता है।

कैसे पहुँचें: मसूरी से संकरी बस या टैक्सी में और वहां से आगे ट्रेक करके या टैक्सी के मद्धम से भी आप दुर्योधन मंदिर पहुंच सकते हैं।

दुर्योधन मंदिर से जुडी पौराणिक कथा: माना जाता है की दुर्योधन मंदिर उसी जगह पर स्तिथ है जहाँ दुर्योधन ने पांडवों के लाक्षागृह को नष्ट किया था। यहाँ के लोग आज भी दुरयोधन को अपने राजा के रूप में पूजते हैं और वर्षों पुरानी बहुतित्व या पॉयंड्री की प्रथा को आज भी मानते हैं। इस दुर्गम क्षेत्र की महिलायें आज भी शहरों की महिलाओं से ज्यादा स्वतन्त्र तरीके से अपने जीवन का निर्वाह करती हैं और अपना पति चुनने या छोड़ने की उनको आज़ादी है। इन दूरस्त इलाकों में आज भी लोग लोग बहुत सरलता से जीवन जीते हैं और अगर आप यहाँ जाएँ तो आपको इसी सरलता का अनुभव होगा।

कैसे पहुँचें: मनाली से ऑटो रिक्शा के माध्यम से या पैदल चल कर भी आप मनु मंदिर पहुंच सकते हैं।

मनु मंदिर से जुडी पौराणिक कथा: भारत वर्ष के सभी मंदिरों में से बस यह एक मंदिर है वो ऋषि मनु को समर्पित है। हिन्दू पुराणों के अनुसार ऋषि मनु मनुष्य सभ्यता में पहले मनुष्य थे। एक प्रलय के बाद उन्होंने हमप्ता नाम के एक पर्वत से अपनी नाव को बंlधा जिससे मनुष्य और कई और पशु जातियों की रक्षा हो सकी।

कैसे पहुँचें: अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर स्तिथ इस मंदिर में कार , टैक्सी या बस के माध्यम से पहुंच सकते हैं।

जागेश्वर मंदिर से जुडी पौराणिक कथा: जागेश्वर का मंदिर प्रांगण 8 से 18वी शताब्दी के बीच बना था। यहाँ के स्थानीय लोग मानते हैं की शिव भगवान् ने यह स्थान अपने ध्यान के लिए चुना था। उनकी तपस्या के समय पर यहाँ राक्षशों ने उनकी तपस्या भंग करने की कोशिश की। तब भगवान् सैम से त्रिनेत्र का रूप लिया और अपने गणों को राक्षसों के नाश के लिए भेजा। यह भी मlना जाता है की भगवान् सैम कलयुग में मानव जाती की उद्धार के लिए कोट लिंग नाम के इस मंदिर में दर्शन देंगे। आदि शंकराचार्य ने यहाँ पर एक भव्य मंदिर बनाने की कोशिश की पर यह चेष्टा सफल नहीं हो सकी। लोग मानते हैं की भगवान् सैम चाहते थे की जागेश्वर की यह भूमि बस शिव भगवान् की तपस्या के लिए प्रयोग में आये। इस पुराने मंदिर के अवशेष आज भी कोटलिंग में देखे जा सकते हैं। यहाँ के लोग आज भी मानते हैं की कलयुग में मानव जाती का उद्धार करने हेतु यहाँ पर सैम या लकुलीश नाम से भगवान् दर्शन देंगे और जागेश्वर में कॉलिंग मंदिर का निर्माण करेंगे। (क्रेडिट्स: विकिपीडिया)

कैसे पहुँचें: आप कठगोदम तक रेल से सफर कर सकते हैं। काठगोदाम से द्वाराहाट 88 किलोमीटर है। यह दूरी आप टैक्सी या बस के माध्यम से पूरी कर सकते हैं।

द्वाराहाट से जुडी पौराणिक कथा: हिंदी में द्वाराहाट का संधिविच्छेद किया जाए तो इसका अर्थ है "स्वर्ग का द्वार"। यह भारत के सबसे प्राचीनतम मंदिरों में से एक है और यहाँ कत्यूरी वंश का राज था। इस छोटी सी जगह में 55मंदिर स्तिथ हैं जो की यहाँ आने वाले यात्रियों को एक अनोखा आध्यात्मिक अनुभव देते हैं।

कैसे पहुँचें: पाताल भुवनेश्वर पिथौरागढ़ जिला स्तिथ गंगोलीहाट से 15 किलोमीटर दूर है। यहाँ पहुंचने से आधा किलोमीटर पहले रोड ख़त्म हो जाती है इसलिए मंदिर तक आपको पैदल ही यात्रा करनी होगी।

पाताल भुवनेश्वर से जुडी पौराणिक कथा: पाताल भुवनेश्वर की यह गुफा का वर्णन स्कन्द पुराण के मानस खंड में होता है। यह कहा जाता है की इस गुफा का निर्माण ब्रह्मा द्वारा ब्रह्माण्ड की रचना के दौरान किया गया। यह भी माना जाता है की चारो प्रतिष्ठित हिंदी धामों के शिवलिंग से जल बह कर यहाँ आता है और इस कारण इस गुफा की अनोखी बनावट है। हिन्दू धर्म के सभी ३३ कोटि देवी- देवताओं की छवि इन चूना पत्थर की गुफाओं में बानी हुई है। अंदर जाने के रास्ते में रेलिंग व मेटल की जंजीरें हैं और अब अंदर रौशनी का इंतज़ाम भी है। यहाँ के लोग यह भी मानते हैं की पांडव अपनी यात्रा के दौरान यहाँ भी आये थे और यहाँ का मंदिर स्वयं अदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया है।

कैसे पहुँचें: आप अगर गुवाहाटी पहुंच जाएँ तो वहां से आप आसानी से कामाख्या मंदिर भी जा सकते हैं।

कामाख्या मंदिर से जुडी पौराणिक कथा: भारत भर में स्तिथ ५१ शक्ति पीठों में से कामाख्या देवी की अपनी अनोखी महत्वता है। मlना जाता है की यह मंदिर उस स्थान में है जहाँ सती की योनि धरती पर गिरी थी। अगर आपको इस कथा के बारे में जानकारी नहीं है तो, विकिपीडिया पर इसका विस्तार से वर्णन किया गया है।

"शक्ति की पूजा आज आम है पर इस प्रथा की शुरुवात हुई सती की कहानी से। माना जाता है की सती भगवान् शिव की पत्नी थी और पौराणिक भगवान् दक्ष की पुत्री थी। राजा दक्ष को अपनी पुत्री के शिव भगवान् से विवाह पर आपत्ति थी और इस कारण उन्होंने जब सभी देवताओं के लिए एक भव्य यज्ञ आयोजित किया तो उसमें भगवान् शिव और देवी सती को आमंत्रित नहीं किया। इससे नाराज़ हो कर सती ने अपने आप को हवन अग्नि में झोंक दिया। उनको ज्ञात था की उनके अग्नि में समाते ही यह हवन असफल हो जायेगा। सती ने अपनी शक्ति से अपने शरीर के सभी अंगों को धरती के विभिन्न कोनो में छोड़ दिया ताकि वे देवी पार्वती के रूप में फिर से जन्म ले सकें। इस सब के दौरान शिव भगवान् अपनी पत्नी को खोने के कारण क्रोध और दुःख में थे।

उन्होंने सती के मृत शरीर को अपने कन्धों में ले पूरे ब्रह्माण्ड में तांडव शुरू किया और शरीर के खंडन होने तक न रुकने की प्रतिज्ञा ली। सभी देवता इस कारण चिंता में थे की शिव के तांडव के कारण ब्रह्माण्ड का विनाश न हो जाए इसलिए वे विष्णु भगवान् के पास गए ताकि वे शिव भगवान् को रोक सकें। तब जहाँ भी शिव गए विष्णु भगवान् उनके पीछे पीछे गए। उन्होंने तब अपने सुदर्शन चक्र के माध्यम से सती के मृत शरीर की कई खंड कर दिए। यह मृत शरीर के खंड भ्रमांड के कई कोनो में गिरे और शिव के कधों में सती के शरीर का वज़न हटा। हिन्दू धर्म में माना जाता है की सती के शरीर के ५१ हिस्से हुए। इन सभी जगहों को शक्ति पीठ के नाम से जाना जाता है और यह सभी जगहें शक्तिशाली देवियों को समर्पित है। "

कैसे पहुँचें: चोपता से तुंगनाथ का 5 किलोमीटर का पैदल रास्ता है। चोपता पहुंचने के लिए देहरादून से टैक्सी ले सकते हैं। आप इस मंदिर में जाने के लिए देओरीयताल से चद्रशिला तक का ट्रेक भी कर सकते हैं। रास्ते में यह मंदिर आपको मिलेगा।

तुंगनाथ के बारे में पौराणिक कथा: तुंगनाथ पंच केदार में से एक मंदिर है। माना जाता है की अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए जब पांडवों ने शिव भगवान् का पीछा किया तो उनको एक बैल के रूप में शिव भगवान् मिले। ऐसी ही पांच जगहें और हैं जहाँ शिव के दर्शन हुए। उन्हें पंच केदार के नाम से जानते हैं। चंद्रशिला छोटी में शिव भगवान् के हाथों के दर्शन हुए थे।

कैसे पहुँचें: पालमपुर से 14 किलोमीटर की दूरी पर इस मंदिर में टैक्सी या बस के माध्यम से पहुंच सकते हैं।

तुंगनाथ से जुडी पौराणिक कथा: यह जान कर आपको ताज्जुब होगा की इस पौराणिक मंदिर में सबसे पहले रावण की पूजा की जाती थी। करीब १००० साल पहले यहाँ पर दो व्यापारी भाइयों ने शिवलिंग के आस पास शिव मंदिर की स्थापना की। रावण शिव के बहुत बड़े भक्त थे और कहते हैं की सतयुग में वे यहाँ ध्यान करने आये थे। बैजनाथ मंदिर प्रांगण के पानी को आरोग्यकर माना जाता है और आज भी यहां पूरे देश से लोग दर्शन करने आते हैं।

कैसे पहुँचें: मार्तण्ड सूर्य मंदिर के लिए आपको अनंतनाग से आसानी से टैक्सी मिल जाएँगी

मार्तण्ड सूर्य मंदिर से जुडी पौराणिक कथा: करकोटा वंश के राजा ललितादित्य ने इस मंदिर की स्थापना की थी। कई ग्रंथों में भी इस मंदिर की भव्यता और इसके वास्तुशिल्प के बारे में लिखा गया है। सर्दियों के मौसम में माना जाता है की बर्फ के बीच यह मंदिर जगमगाता था। पर आज के समय में यह मंदिर दयनीय अवस्था में है। मुग़ल काल के शाशक सिकंदर बुतशिकन ने इस मंदिर का विनाश कर दिया था। पर यह भी माना गया है की सिकंदर बुतशिकन से पहले भी कई विदेशी शाशकों ने इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश की थी पर उनसे यह हो न सका। कहते हैं की इस मंदिर को 370-500 AD में बनाया गया और इस मंदिर को युगों युगों तक ऐसे ही खड़े रहने का वरदान है और कोई भी मानवीय सकती इसको गिरा नहीं सकती।

आज अगर आप इस मंदिर में जाएँ तो इसकी जर-जर हालत को देख आपको भी बहुत दुःख होगा। पर इस मंदिर के खंडहरों को देख कर आज भी पता चलता है की एक समय पर यह मंदिर कितना भव्य और सुन्दर हुआ करता होगा। यह हमारा दुर्भाग्य ही है की हम इस मंदिर को इसकी असली भव्यता में कभी नहीं देख पाएंगे।

कैसे पहुँचें: पहलगाम पहुंच कर वहां लिद्दर नदी के किनारे बसे इस 900 साल पुराने मंदिर के बारे में आप किसी से भी पूछ लीजिये। आपको रास्ता मिल जायेगा।

ममलकंदम से जुडी कथा: देख कर यह आपको कोई आम शिव मंदिर ही लग सकता है पर अनोखी बात यह है की कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के जाने के बाद से इस मंदिर की देखभाल दो मुसलमान भाई कर रहे हैं। यह इन दो भाई मोहम्मद अब्दुल्लाह और गुलाम हसन के ही कारण है की आज भी इस मंदिर के कपाट खुले है और सुबह शाम यह जगह मंदिर की घंटियों की आवाज़ से गूज उठती है। लोग कहते हैं की मंदिर छोड़ के जाते वक़्त पंडित किशन ने अपने दोस्त अब्दुल भट को मंदिर की चाबियां सौंप दी और उनकों हिदायत दी की वो जो ठीक समझें, करें। तब से आज तक कश्मीरी मुसलमानों ने ही इस मंदिर की देख भाल की है।

कैसे पहुँचें: यह मंदिर श्रीनगर में सुलैमान पहाड़ी पर स्तिथ है।

शंकराचार्य मंदिर से जुडी कथा: माना जाता है की आदि शंकराचार्य इस मंदिर में आये थे जिसकी स्थापना 200 BC में हुई थी। अगर आप सोच रहे हैं की २०० BC कितना पहले था तो आपको यह बता दें की 200 BC पूर्व भी चीन की दीवार भी बन कर तैयार हुई थी।

क्या आप भी भारत के उन कोनों में घूमें हैं जहाँ के बारे के किस्से कहानियां बहुत हैं? हमारे साथ होने सफर की कहानियां साझा करें Tripoto में।

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